कविता

खा खा खा

विन्दु दाहाल

खा खा खा सब खा नदी वन तँ खा माटो र ढुङ्गो तँ खा
भाषा खा अब खा कलाकृति तँ खा संस्कार सारा तँ खा
माया प्रेम तँ खा कुलो नहर खा बाटा फलैँचा तँ खा
खा खा खा स्कुल खा कलेज पनि खा धारा र पाटी तँ खा ।

खा खा धर्म विहार मन्दिर तँ खा अड्डा र भन्सार खा
खा खा कानुन अस्पताल सब खा यी पार्क उद्यान खा
खा खा ताल जडीबुटी पनि तँ खा पाखा पखेरा तँ खा
यातायात तँ खा र वीउ मल खा सन्चार खोला तँ खा ।

खा खा शान्ति तँ खा शहीद सुविधा सम्पूर्ण भत्ता तँ खा
खा खा खा सब रेमिटेन्स पनि खा बेचेर सीमा तँ खा
खा खा खा पसिना गरीब जनका छाला र हड्डी तँ खा
खा खा खा रुपियाँ भटाभट तँ खा उद्योग धन्दा तँ खा

खा खा खा सुन खा फलाम पनि खा हीरा र मोती तँ खा
खा खा खा गिरि या हिमाल पनि खा रोडा गिटी खा तँ खा
खा खा यो घरको विमान पनि खा नाफा मुनाफा तँ खा
खा होली सिमसार खा बगर खा नापी गराई तँ खा

खा पेट्रोल डिजेल खा मबिल खा गाडी सवारी तँ खा
खा खा जङ्गलका सबै पशु तँ खा उड्ने र कुद्ने तँ खा
खा खा खा सपना र खा तँ विपना भेटिन्छ के के तँ खा
खा खा खा सब सार्वभौमिकपना नेपाल आमा तँ खा

फाल्गुन ८, २०७६ मा प्रकाशित
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